साहित्य मंच

साहित्य मंच-अमरजीत यादव ‘अमर’ की चुनिंदा रचनाएँ

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साहित्य मंच-अमर’ की चुनिंदा रचनाएँ


गिरोह उनका हमारी ग़ज़लें हमेशा ख़ारिज करेगा लेकिन ।
नये ज़माने के शाइरों में उन्हें हमारे निशाँ मिलेंगे ।

किसे पता है कि किस जनम में कहाँ के बिछड़े कहाँ मिलेंगे।
किसी से वादा नहीं किये हम यहाँ मिलें या वहाँ मिलेंगे ।

कहे है मनवा हमार हमसे की जब भी दिनकर को ढलते देखूँ।
वहीँ पे हम भी मिलेंगे शायद जहाँ धरा आसमाँ मिलेंगे ।

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किसी के इश्क़ में हम ख़ूब टूटे ।
किसी के इश्क़ ने हमको सँवारा ।।

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जो हुआ था सो हुआ तुम ठीक हो ?
छोड़िये शिकवा गिला तुम ठीक हो ?

हाल दुनिया से हमारा पूछियो ।
मै कहूंगा क्या भला तुम ठीक हो?

यार जो भी थे किनारा कर लिये ।
कह रहे सब बावला तुम ठीक हो ?

फ़ोन करके बोलना था अलविदा ।
फ़ोन लगते ही कहा तुम ठीक हो ?

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हम जैसे तो जनगणना के खातिर हैं,
हम जैसों से कौन मुहब्बत करता है।

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लबों पे लब रखे हैं बेख़ुदी में ।
हम इक दूजे का चरबा कर रहे हैं ।

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सिर्फ़ मिसरे कमाल होते हैं ।
कोई शायर बड़ा नहीं होता ।

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बिछड़ कर आप से मरना नहीं था ।
इसी अवसाद में ग़ज़लें कही हैं ।

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वफ़ा के बदले वफ़ा की चाहत करोगे तुमको भी ग़म मिलेंगे।
तमाम वादे करेंगे लेकिन निभाने वाले ही कम मिलेंगे ।

कोई बनेगा ख़ुदा सरीखा कोई बनेगा अदीब लेकिन ।
गँवार लोगों की पहली सफ में ज़हीन लोगों को हम मिलेंगे।

दुःखों को दिल में समेट करके तमाम चेहरे हैं रोज़ हँसते ।
क़रीब जाके निहारियेगा तो कोर नयनों के नम मिलेंगे ।

अभी तलक है किसी के आने की चाह दिल में सो जी रहे हैं।
बिछड़ रहे थे गले से लग के कहा था उसने की हम मिलेंगे ।

यही दिलासा दिया हमेशा मिलन की बातों पे उस परी ने ।
अभी नहीं हम मिलेंगे पक्का कि जब रज़ाई व ज़म मिलेंगे ।

अभी चले हैं हमारी साँसे अभी जहाँ को ख़बर नहीं है ।
पढ़ेगी दुनिया हमारी ग़ज़लें सो हम जहाँ से ख़तम मिलेंगे ।

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किसी दिन आजमाएगी मुहब्बत ।
किसी दिन ज़ख्म में काँटे चुभेंगे ।।

किसी दिन भूल जाएँगे तुम्हें भी ।
किसी दिन मौत से आगे बढ़ेंगे ।।

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तुम्हारा फोन नम्बर चाहते हैं
अगर वाज़िब लगे तो भेज देना


अमरजीत यादव ‘अमर’
बाराबंकी (उत्तर प्रदेश)


संदीप राज़ आनंद

साहित्य संपादक

The Praman

संदीप राज़ आनन्द
संदीप राज़ आनन्द Contributing Scholar

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